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Saturday, April 7, 2018

"मेरा, मुझको ही दे रहा है" हिन्दी लघु कथा। Hindi story.

मेरा, मुझको ही दे रहा है। ये कहानी उन लोगों के लिए है। जो ईश्वर को दान दक्षिणा देकर, खुद को बड़ा भक्त समझने लगते हैं। और कुछ तो ये सोचते हैं कि भगवान को जितना ज्यादा दान देंगे। वो उतने ही ज्यादा खुश होंगे। जबकि भगवान दक्षिणा कि नहीं, बल्कि "भाव" के भूखे हैं। उन्हें सिर्फ भक्ति भाव चाहिए। ईश्वर भी हम इंसानों की तरह प्रेम का भूखा होता है, दान में मिले सामानों का नहीं। इस बात को ठीक तरह से समझाने के लिए पेश है "मेरा मुझको ही दे रहा है हिन्दी लघु कथा।

मेरा मुझको ही दे रहा है हिन्दी लघु कथा।

एक बार एक आदमी, किसी काम से मुखिया के घर आया। मुखिया जी घर में नहीं थे। तब मुखिया के नौकर ने उस आदमी को मेहमान कक्ष में बैठाया। वह आदमी ख़ाली हाथ आया था। तो उसने सोचा कि कुछ उपहार देना अच्छा रहेगा। तो उसने वहीं दीवार पर टंगी एक तस्वीर (painting) उतारी। और जब मुखिया घर आया। तो उसने वही तस्वीर मुखिया को देते हुए कहा ,यह मैं आप के लिए लाया हूं।
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मुखिया तस्वीर देखते ही पहचान गया। कि ये मेरी ही तस्वीर है। अपनी ही चीज, उस आदमी के हाथों उपहार के रूप में पाकर मुखिया सन्न रह गया। और मन में सोचा कि "कितना मूर्ख आदमी है। मेरा, मुझको ही दे रहा है।"

कथामर्म:

अब आप ही बताइए। क्या वह भेट पाकर, जो कि पहले से ही उसका है, क्या मुखिया को खुश होना चाहिए ? मेरे खयाल से नही। लेकिन यही चीज हम भगवान के साथ करते हैं। हम उन्हें फूल, फल और हर वो चीज, जो उनकी ही बनाई है। उन्हें ही दान दक्षिणा के नाम पर भेट करते हैं। और सोचते है कि इश्वर ख़ुश हो जाएगा। हम यह नहीं समझते की, उनको इन सब चीजों की जरूरत नही। दान दक्षिणा करना गलत नही है। लेकिन दान करने का जो तरीका है। वो ग़लत जरुर है। दान के नाम पर, हम सिर्फ बरबादी करते हैं। भगवान को प्रसन्न (खुश) करने के लिए। जो नियम, धर्म, कर्म बनाए गए हैं। उन सबमें कोई बुराई नही, लेकिन हम लोग उस कर्म को जैसे करते करते हैं। उसमें बुराई जरूर है।

कर्म क्या है, और हम क्या गलत करते हैं:

हर काम के पीछे कोई बड़ा कारण होता है। चढ़ावा चढ़ाने के पीछे भी बहुत बड़ा कारण है। ये नियम इसलिए बनाया गया था। कि भगवान को चढ़ाने के नाम पर, जो भी लोग चढ़ाएं। उसे गरीबों और जरूरतमदों में बांट दिया जाए। लेकिन आज ये नही हो रहा है। आज हमारा चढ़ावा, हमारी भक्ती कम, हमारा आडंबर ज्यादा हो गया है। आज कल दान कर्म से लोग अपने आप को अमीर दिखाने में जुट गए हैं। जो जितना ज्यादा अमीर होता है। वो उतना ज्यादा दान करता है। और तो और, लोग तो ये भी सोचने लगे हैं कि जितना ज्यादा चढ़ावा होगा, भगवान उतने ज्यादा प्रसन्न होंगे।

सही मायनों में लोगों को दान देने और चढ़ावा चढ़ाने का सही तरीका ही नहीं पता है।

जैसे:

  • भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए उन्हें दूध का पूरा ग्लास चढ़ा देते हैं। ये जानते हुए भी कि वो सारा दूध, नाले में चला जाएगा। इसके बावजूद हम सब ऐसा करते हैं। भोलेनाथ को दूध जरूर चढ़ाएं। पर सिर्फ एक बूंद, भोलेनाथ बस इतने में ही प्रसन्न हो जाएंगे। बाकी का सारा दूध, आप किसी गरीब बच्चे को दे दीजिए। तब ये सही मायनों में चढ़ावा कहा जाएगा। क्योंकि वो गरीब बच्चा भी तो तो ईश्वर की ही संतान है। दूध नाले में जाए। उससे बेहतर है कि वो किसी के पेट में जाए। क्यूंकि दूध भी, अन्न है। और अन्न है। और अन्न का अपमान भी पाप है।
  • हम लोग चावल, दाल, फल जैसी कई खाने पीने की चीजे दान में देते हैं। वो दीजिए, पर सिर्फ 10%। बाकी का 90% आप गरीबों को दीजिए। तब जाकर ये सही मायनों में दान दक्षिणा कहलाएगा।
जिस चीज को कर के, हम खुद का भला चाहते हैं। उसी चीज के जरिए। अगर हम दूसरों का भला करेंगे। तो हमारी भलाई खुद-ब-खुद हो जाएगी। तो दोस्तों, हमें पूरी उम्मीद है कि मेरा, मुझको ही दे रहा है कहानी से बड़ी सीख मिली होगी। अंत में हम बस इतना कहेंगे कि दान दक्षिण कीजिए। पर वहां, जहां पर जरूरत हो।

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